ना हम गरीब पचाने की सैर में थे
मैया से मिलने गाँव को निकले चार दिनही हुएथे
कल रात ही पानी भिगोकर सुखी रोटी दाँतो ने तोड़ी थी
रेल की पटरी थका देता था बदन को जब
पत्थर वाली रोटी फिर थैले मैं रखली तब
मिलने की माँ को मेरी हर गुजाईश टूटी सब
बूढ़ी आस से जुड़ने वाली हर कड़ी तोड़ी अब
कोरोना से डर के भागे थे गाँव की और सब
कल रोटी से हारा था आज कोरोना से बेबस