फिर दिखाया कल रात का जख्म
वही बासी सी कहानी दोहराई
मारा पीटा मर्द ने घर टूटा-फूटा सब
पर आज कुछ नया तड़का भी था कहानी मैं
आज मिट्टी का चुल्हा बनाया भाभी मैंने
पूछा क्यो मिट्टी का चूल्हा..केरोसिन नही है क्या
चीड़ के बोली भाभी केरोसिन के पैसे नही बचे
घर मे जो चावल थे पतिने फेक दिया कल रात
आज ना मरने की बात कहीं उसने
ना घर छोडने तोड़ने की ज़िद
एक बूढ़ा लाचार भी बैठा है इस कहानी में
आँसू भीगें चहेरे से बोली "भाभी"
जब मुस्कुराए गाल उसके तो आँसू और फैले
आँसू वाले भीगें चहेरे से फिर बोली 'भाभी'
भाभी मुझे एक लड़का पसंद है,
रोज मुस्कुराता है मुझे देखकर, पास आता हैं।
हमने समजाया, कुछ प्राणी-प्रजाति के नाम गिनवाए,जो मेल खाते थे चिड़ियाघर केगिद्धोंसे
फ़िर भी वह रुकी नही थकी नही उस लड़के की बात करके,खिलती सी गइ,
वह भूल गई, दो मुठ्ठी चावल लेकर घर जाना है
मिट्टीके चूल्हे मैं चावल पका कर बाबा को खिलाना है ।
रोज चोट खाने वाला चहेरा आज खुशी से रुखसत हुआ।
चूल्हे पर आज वह उसूल नही पकाएगी
महगाई की भट्ठी पर प्रेम का दाना उबला है
फलसफे की शाखा का ढांचा अभी अभी तो टूटा है।
अब शिकन माथे पर समाज के चोंचलों की
कोड़े लगादो या चाबूक इस कहानिको या बन जाओ जज साहब सजा सुनाने को।
पर आज भी वह आ कर कहेगी "भाभी"!
घर और रिश्ते चले हे आजभी खोखली बैशाखी पर,