उस नफ़रत को देखा ऊँची दीवार के साए जैसी
अब इस्तीफ़ा दो ओ ज़हर के बीज बोनेवालो
कल कोई तराशेगा खुद को शब्दों की नोंक पर
अकड़ तोड़ दो उस साए की जो बिच्छू बन बैठा
दिल हर बात ख़ामोशी से मान क्यू ले अब
यह क्या अंदाज है उनकी नजरअन्दाजगी का
लिखावट मैं बू है तेरे मंदिर मस्जिद की
रफ़्तार धीमी कर उस खोलते मुखौटों की