Tuesday, 28 April 2020

शब्दों का जहर

उस नफ़रत को देखा ऊँची दीवार के साए जैसी
अब  इस्तीफ़ा दो ओ ज़हर के बीज बोनेवालो

कल कोई तराशेगा खुद को शब्दों की नोंक पर
अकड़ तोड़ दो उस साए की जो बिच्छू बन बैठा

दिल हर बात ख़ामोशी से मान क्यू ले अब
यह क्या अंदाज है उनकी नजरअन्दाजगी का

लिखावट मैं बू है तेरे मंदिर मस्जिद की
रफ़्तार धीमी कर उस खोलते मुखौटों की