बख़्श भी दो
जूठ को पर ना लगाओ सियासत के
की मन की चादर विषैली मैली भाति नहीं।
जो घर मे थे वह शाम तक खबरों को रंग दे चूके
जो घर जाने की होड़ में थे वह दौड़ ही नही पाए।
जदोजहद कुछ हमारी भी कम नही थी
पहुँचना था आपके जहन मन तक।
पहुंचा देना खबर हमारे गाँव तक
की हम बस आते है।